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Success stories at fertility clinic in India
IVF-ICSI एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें fail होने का डर हमेशा बना रहता है, खासकर जब
आप बोहुत ही difficult cases को हाथ मे लेते हो, खासकर Low AMH, एंडोमेट्रियोसिस, PCOD, azoospermia इत्यादि। विशेषकर poor ovarian reserve
( जिनके अंडे बोहुत ही कम बनते हैं) वाले केसेस में बोहुत
बार बीच में रुकना भी पड़ जाता है। इस अवस्था मे दम्पत्ति को बड़ी हताशा होती है,
पर मेरा उद्देश्य यह रहता है कि मैं कपल को उनके बच्चे का बायोलॉजिकल पैरेंट बनाऊं।
मेरी कोशिश यही रहती है कि दम्पत्ति को इसके ऊंच नीच(pros and cons) की पूरी
जानकारी काम शुरू होने से पहले रहे, ताकि एक relaxed atmosphere में काम हो सके। कोई भी काम तभी सफल हो सकता जब आप रिस्क लें। पर इस रिस्क को लेने के पहले कंडीशन्स एवं खर्च पर जरूर ध्यान दें, क्या आप mentally एवं economically इसको afford कर सकते है।
डबल स्टिमुलेशन या luteal phase stimulation को लेकर कुछ बातें क्लियर होनी चाहिए, खासकर उन महिलाओं में जिनका AMH बोहुत काम है, उनकी उम्र 35 से अधिक है, इसमें सफलता का चांस 15 से 20 % तक ही होता है, कई बार ट्रीटमेंट को बीच में रोकना भी पड़ सकता है(
यदि अंडे नही बनें तब), इस विधि में कपल को pschologically स्ट्रांग होना जरूरी है, नही तो कई बार वे frustrate हो जाते हैं,
इसका उद्देश्य केवल दम्पत्ति को अपने बीज से अपना बच्चा करने का अंतिम चांस देना।
Low AMH वालों को पहले से मालूम होना चाहिए कि खुद के अंडों से ट्रीटमेंट fail होने का चांस काफी अधिक है, तभी इसपर पैसे लगाएं

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